रमायन सार दोहा छंद में

सुम्मत ले गाड़ी चलय,बनथे बिगड़े काज।
अइसे भारत देश मा,अवधपुरी हे राज।।

राजा दशरथ के महल,रानी रहिथे तीन।
देवइया पानी घलो,बेटा नइहे एक झीन।।

बेटा बनके राम हा,राजमहल मा आय।
अवधपुरी नाचे लगे,भर भर मन हरसाय।।

कैकैयी रानी सुने,राम राज के बात।
सुधबुध सबला त्याग के,खाय नही ओ भात।

बनही राजा अब भरत,राम जही बनवास।
बात मोर तै मान ले,तभ्भे आही रास।

राम सिया भाई लखन,जावय गंगा पार।
अड़हा केंवट हा घलो,तार डरे परिवार।।

पंचवटी बनगे कुटी,सुख्खा डारा पान।
हर लेगे माता जानकी,रावन जे शैतान।।

खोजत सीता राम हा,जटायु दिये उबार।
जूठा बोइर बाँटके,शबरी होगे पार।।

रघुवर अउ सुगरीव जी,सुग्घर बधे मितान।
सुखदुख सब ला जान के,किरपा दे भगवान।

मातु सिया के खोज बर,चंगा हे हनुमान।
बाधा जम्मो भाग गे,लगे राम के ध्यान।।

साधु कुटिया देखके,गये विभीषण तीर।
गोठ बात मा जान गे,मातु सिया के पीर।।

वाटिका पहुँचे तभे,मिले सिया के शोर।
राम बसा के ध्यान मा,भुँजे गली सब खोर।

पाए सिया के शोर जब,पहुँचे लंका धाम।
रावन के परिवार के,करदिस काम तमाम।।

सिया राम भाई लखन,आय अवधपुर धाम।
बरगे दीया चौमुड़ा,राम सिया के नाम।।

तोषन के हे लेखनी,लिखे रमायन सार ।
माँगत हावँव दव क्षमा,गलती देहु जी टार।

तोषन धनगंइहा

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