छत्तीसगढ़ अउ मध्य भारत के ग्रामीण संस्कृति म 'बरसात के पहिली घर के खपरा उलटाई' (घर के खपरैल संवारना) सिरिफ़ एकठो काम नोहे, बल्कि एहा एक बड़े परंपरा, उत्सव अउ सामूहिक सहभागिता के प्रतीक आय। जेठ के महिना म जब सुरूज देवता अपन कड़ा घाम ले धरती ला तपाथे, तब गांव-गांव म मानसूनी पानी ले बचे के तैयारी सुरू हो जाथे।
छत्तीसगढ़ी संस्कृति, जनजीवन, अउ ओकर अर्थव्यवस्था म खपरा उलटाई के का महत्व हे, एला हमन समझना चाही।
** खपरा उलटाई : एक परिचय अउ महत्ता*
छत्तीसगढ़ म ग्रामीण घर मन के बनावट म 'खपरैल' (खपरा वाले छत) के एक विशेष स्थान हे । ए छत मन ला माटी के पकाए हुए लाल खपरा ले छाए जाथे। सालभर के घाम, हवा अउ बेंदरा मन के कूद-फांद के सेती खपरा मन अपन जगह ले हिल जाथें, कतको खपरा फूट जाथें, अउ ओकर भीतर म कचरा घलो जमा हो जाथे।
यदि बरसात के पहिली ए खपरा मन ला ठीक नइ करे गिस, त पहिलीच पानी म घर के भीतर पानी चुहे बर लगही। जेकर ले घर के माटी के दीवार (भींत) अउ भीतर रखे अनाज-सामान सब खराब हो सकट हे । एखरे सेती, 'बरसात के पहिली खपरा उलटाई' के काम ला सबले जादा प्राथमिकता दिये जाथे।
** खपरा उलटाई के सही समय : जेठ के महिना*
खपरा उलटाई के काम जादातर बैसाख के आखिरी अउ जेठ (मई-जून) के महिना म करे जाथे। एकर पाछू कतको विज्ञानिक अउ बेवहारिक कारन हे:
• कड़ा घाम (सूखा मौसम): ए समय म छत सबो डहर ले सूखा रहिथे, जेकर ले छत म चढ़ के काम करना सुरक्षित होथे।
• लकड़ी के सुरक्षा: छत के भीतर लगे बांस अउ धारन घलो सूखे रहिथें। ओ मन म दीमक या कीड़ा लगे हे कि नइ, एहा साफ दिख जाथे।
• खेती-किसानी ले फुरसत: ए समय म रबी के फसल कट चुके रहिथे अउ खरीफ के काम सुरू नइ होए रहय। किसान मन करा ए काम बर पूरा समय रहिथे।
** खपरा उलटाई के पूरा प्रक्रिया*
खपरा उलटाई के काम कोई अचानक होए वाला काम नोहे, एकर बर हफ्ता भर पहिली ले तियारी करे बर पड़थे। ए प्रक्रिया ला हमन ए प्रकार ले समझ सकथन:
*क. तियारी अउ समान के बेवस्था*
सबले पहिली घर के मालिक ओ खपरा मन के गिनती करथे जे मन टूट चुके हैं। कुम्हार मन करा जाके नवा खपरा बिसाए जाथे। एकर साथ-साथ:
• बांस अउ रस्सी: छत के भीतर के ढांचा ला मजबूत करे बर नवा बांस अउ छेरी-छाल या सुतरी के रस्सी तियार रखे जाथे।
• पेड़ के डंगा (लकड़ी): जरूरत पडे म धारन बदले बर।
*ख. खपरा मन ला उतारना अउ छांटना*
काम के दिन, बिह्ना-बिह्ना घाम कड़ा होए के पहिली, घर के सियनहा अउ युवा मन छत म चढ़ जाथें।
• सबले पहिली पुराना खपरा मन ला एक-एक करके धीरे-से उल्टाय जाथे।
• ओ खपरा मन ला देखे जाथे जे मन सही-सलामत हैं, अउ जे मन फूट गए हें ओला अलग कर दिये जाथे।
• खपरा के नीचे जमे धूल, पाना-पतरा अउ बेंदरा मन के लाए कचरा ला साफ करे जाथे।
*ग. बांस-बल्ली (ढांचा) के मरम्मत*
खपरा ला हटाए के बाद छत के मुख्य ढांचा मयारी, धारन अउ बांस के कमचिल चटई दिखे लगथे।
• जे कमचिल चटई सड़ जाए रहिथे, ओला बदल दिये जाथे।
• नवा बांस मन ला रस्सी ले कड़ा बांधे जाथे जेकर ले मानसून के तेज हवा म छत मत उड़े।
*घ. खपरा ला फेर से छाना (बिछाना)*
एहा सबले हुनर के काम ए। खपरा ला ए प्रकार ले एक-दूसरे के ऊपर फंसा के रखे जाथे कि पानी के एक बूंद घलो भीतर झन जा सके।
• नीचे ले ऊपर की ओर खपरा ला जमाए जाथे।
• कतको जगह म 'नवा खपरा' ला ओ जगह म लगाए जाथे जहां पानी चूहे के चांस जादा रहिथे (जैसे ओरी या कोना म)।
** 'बदला' अउ 'संगी-जवांरा' : समूहिक सहभागिता के सुंदर रूप*
छत्तीसगढ़ी संस्कृति के सबले सुंदर बात ए ओकर 'सामूहिकता' । खपरा उलटाई के काम अकेले एक झन के बस के बात नइ होवय। एकर बर पूरा पारा-पड़ोसी अउ नात-रिश्तेदार मन जुटथें। एला छत्तीसगढ़ी म 'बदला' या 'मदद' परंपरा कहे जाथे।
बदला परंपरा का ए?
"आज महूँ ह तोर घर के खपरा उलटवाए म मदद करहूं, त काली तहूँ ह मोर घर म हाथ बंटाबे।" ए परंपरा म कोई पैसा के लेन-देन नइ होवय, बल्कि महिनत के आदान-प्रदान होथे।
ए दिन घर म एक उत्सव कस माहौल रहिथे। काम करे बर आए संगी-जवांरा मन बर बियारी (खाना) अउ जलपान के विशेष व्यवस्था करे जाथे। पेज (चावल का मांड), बासी, अउ आम के चटनी ए दिन के मुख्य अहार होथे। काम करत-करत ददरिया गाए जाथे, जेकर से कड़ा घाम म घलो थकावट के पता नइ चले।
** खपरैल घर के वैज्ञानिक अउ पर्यावरणीय लाभ*
आजकल भले ही सीरमेंट के पक्का घर (आरसीसी छत) के चलन बढ़ गए हे, फेर पारंपरिक खपरैल मकान मन के अपन वैज्ञानिक महत्व हे , जेला आज के पर्यावरणविद् घलो मानथें:
*विशेषता*
खपरैल घर (माटी-खपरा)
तापमान नियंत्रण- गर्मी म ठंडा अउ जाड़ म गरमाहट देथे।
हवा के आवागमन- खपरा के बीच के झिर्री ले हवा आर-पार होथे
लागत- स्थानीय माटी अउ बांस ले बनथे, बहुत कम लागत।
पर्यावरण सबो डहर ले इको-फ्रेंडली
कंक्रीट घर (सीमेंट)
गर्मी म बहुत जादा गर्म अउ ठंड म कड़ा ठंडा। हवा रुक जाथे, उमस बढ़थे।लोहा, सीमेंट, रेत के सेती बहुत महंगा।कार्बन उत्सर्जन जादा होथे।
खपरा के घर म उमस नइ होवय। बरसात के दिन म जब बाहर कड़ा उमस रहिथे, तब खपरैल घर के भीतर एकदम सुग्घर, ठंडी हवा अउ माटी के सोंधी महक आथे।
** आधुनिकता के दौर म बदलत सरूप अउ चुनौतियां*
समय बदलत हे, अउ ओकर साथ-साथ गांव मन के रूप-रंग घलो बदलत हे। आज खपरा उलटाई के ए सुंदर परंपरा धीरे-धीरे कम होत जावत हे। एकर पाछू कतको कारन हे:
1. पक्का घर मन के बढ़त चलन: प्रधानमंत्री आवास योजना अउ आर्थिक तरक्की के सेती अब गांव-गांव म सीमेंट के छत वाले घर बन गय हे।
2. महिनत के कमी: आजकल युवा पीढ़ी ए कड़े मेहनत वाले काम ले दूर भागत हे।
3. कुम्हारी कला के ह्रास: खपरा बनाए वाले कुम्हार मन के संख्या घलो कम होत जावत हे, काबर कि बाजार म अब एक्सीलेटर या कंक्रीट के चादर मिल जाथे।
फेर, आज घलो छत्तीसगढ़ के कतको अंचल जैसे बस्तर, सरगुजा, अउ मैदानी इलाका के आंतरिक गांव मन म ए परंपरा अपन जीवंत रूप म बचे हुए हे।
** सार गोठ*
बरसात के पहिली घर के खपरा उलटाई सिरिफ़ एक गृहस्थी के काम नोहे, बल्कि एहा मनुष्य अउ प्रकृति के बीच के गहरा संबंध ला देखाथे। एहा हम ला सिखाथे कि आने वाले संकट (बरसात) ले पहिली अपन घर (जीवन) ला कइसन मजबूत करे जाथे।
ए परंपरा म छुपे 'बदला भाव' आज के स्वार्थी दुनिया म आपसी भाईचारा अउ सहयोग के बहुत बड़े संदेश देथे। भले ही हमन कतको आधुनिक हो जावन, फेर अपन माटी, अपन खपरा, अउ ओकर उलटाई के दिन गूंजे वाले ददरिया के गूंज हमेशा छत्तीसगढ़ी अउ संस्कारी मन म जिंदा रहिही।
-तोषण चुरेन्द्र ‘दिनकर’
धनगांव डौंडी लोहारा बालोद छत्तीसगढ़
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