घरो घर लगे हे तारा
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गंवई गांव ह सून्ना लागे,
गली खोर अउ पारा।
फदके कातिक चिलचिल बूता,
घरो घर लगे हे तारा।।
बड़े बिहनिया सुत उठके,
भउजी भारा डोहारय।
काम बूता बियापय नहीं,
मुच मुच मुस्की ढारय।।
सालभर के मेहनत...जेन मुहूँ के काँवरा!
गंवई गांव ह.........गली खोर अउ पारा!!
फदके कातिक....घरो घर लगे हे तारा!!!
बासी पेज सब खेते डहर हे,
थोरकुन छांव म सुरतावय।
आज के बासी काली के साग,
खाके जीव ल जुड़ावय।।
भूख म घलो मिठाथे..अलोना होय के खारा!
गंवई गांव ह........गली खोर अउ पारा!!
फदके कातिक...घरो घर लगे हे तारा!!!
गरवा बरोबर सिधवा होथें,
अपन काम ले काम हे।
जुरमिल के सब संग रहिथें,
गांव म चारो घाम हे।।
छत्तीसगढ़िया सबले ब..आवय एके नारा!
गंवई गांव ह........,गली खोर अउ पारा!!
फदके कातिक.... घरो घर लगे हे तारा!!!
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