मकड़ी और जाल
मकड़ी रानी मकड़ी रानी।
अजब गजब तेरी कहानी।
कभी पेड़ में कभी घरों में,
काटती रहती जिन्दगानी।।१।।
लालच में आते कीट पतंग।
भिन्न भिन्न और रंग विरंग।
भोजन थाल स्वयं सजाती,
बड़ी निराली है तेरी प्रसंग।।२।।
काल को नहीं हो जानती।
करती रहती हो जो ठानती।
सीख देती दुनिया को सारी,
हार कभी नहीं तुम मानती।।३।।
नित योजना स्वयँ गुनती।
कहाँ किसी की हो सुनती।
मारे कोई या सताये कोई,
जाला प्रतिदिन हो बुनती।।४।।
जीवन बड़ी तेरी न्यारी है।
फिर भी बनी तू बेचारी है।
महाराणा है तुझसे सीखा,
फिर करी सेना तैयारी है।।५।।
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगंइहा डौंडी लोहारा
बालोद छत्तीसगढ़

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