प्रकृति की शक्ति (तोषण कुमार दिनकर)

विधा घनाक्षरी

( सृष्टि=प्रकृति )

सृष्टि शक्ति क्षीण हुई 
धीरज विहीन हुई,
कोरोना का वायरस
घन बन छाएं हैं।

चर चाहे हो अचर
उपवन बेअधर,
डर यह कालिमा की
रोज मंडराएं हैं।

मुश्किलों की है ये घड़ी
चुनौतियां बड़ी-बड़ी,
थक हार नहीं साथी
क्षणी विपदाएं हैं।

अमीर गरीब सारे 
सब के हो एक नारे,
भागेगा अब कोरोना
चेतना जगाएं हैं।

तोषण कुमार"दिनकर"

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