कविता

काम-बुता चलत हे पेल-ढपेल के ।।

आए हे जबले करोना बीमारी ।
मंहगाई बाढ़ गेहे होगे लाचारी ।
काम बुता चलत हे पेल-ढपेल के ।।

लॉकडाउन मे आएंव तोर घर ।
चटनी समोसा लाएंव तोर बर ।
हवा झन खवाबे तै मोला जेल के ।।
काम-बुता चलत हे पेल-ढपेल के ।।

गोरी मोर मया के लाज रख ले ।
चाही त दु किलो प्याज रख ले ।
का पाबे तै मोर दिल संग खेल के ।।
काम-बुता चलत हे पेल-ढपेल के ।।

चल मानले कहना दाऊ बघेल के ।।
बेच ना तहुं, अब गोबर सकेल के ।।
काम-बुता चलत हे पेल-ढपेल के ।।

         **कृष्णा पारकर**

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