फिर दिल लेकर आया दर पे अब तो बाहर आजा ।
पागल दिल बस तुझे पुकारे खोल अपना दरवाजा ।
दिल से दिल का बंधन है तो फिर क्यों है रूसवाई ।
आशिक़ हूं मै तेरा मुझको एक-झलक दिखलाजा ।
तेरे दरस की आस लेकर, आया मै विश्वास लेकर ।
आस ना टुटे उम्मीदों की, इस दिल को बहला जा ।
काजल,बिंदिया,हार छोड़,अभी सभी श्रृंगार छोड़ ।
तन को प्यासा रहने दे बस मन की प्यास बुझाजा ।
महसुस करूं मै रूह तलक है ये मन की ख्वाहिश ।
मुझे गैर ना समझ तेरा ही हूं मुझमे आज समाजा ।
**कृष्णा पारकर**

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