तिपत भोम्भरा (कविता छत्तीसगढ़ी)


तिपत भोभंरा, जरत  घाम हे।
      चल जी अभी भारी काम हे ।।
घाम के  मारे पसीना ह
           भारी  चुचवावत   हे ।
ए बईरी  घाम के  कारन
            कुछू  नई सुहावत हे।।
डोकरा बबा ह चटनी संग
         बासी ल धडकावत हे ।
ऐला देख डोकरी दाई ह 
        मुसुर- मुसुर मुसकावत हे ।।
पोप पोप आवाज  सुनके
         टुरा के मन ह ललचावत हे।
खीसा में पईसा नई हे  कहिके
        दाई ह  टूरा ल  खीसियावत हे॥
जब ले लगे हे गरमी के  महीना
        टुरी मन  भारी  मेछरावत  हे।
घेरी बेरी मोबाइल कोचक के
            नेट भारी  चलावत  हे।।
ऐला देख डोकरा बबा ह
         टुरी 👱🏻‍♀ल भारी चिल्लावत हे।
चुपचाप रहा डोकरा 👴🏻कहिके
       उल्टा बबा  ल चमकावत हे।।
       
🙏🙏आर्यन चिराम🙏🙏

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