आगे आषाढ़ के महिना गोरी aage ashad ke mahina gori [Krishna parkar][hindi kavita][c.g kavita][kavita] [कृष्णा पारकर][हिंदी कविता][छ.ग. कविता][कविता]

आगे आषाढ़ के महिना गोरी ।
डारा पाना हा हरियावत  हे रे ।
झिमिर झिमिर पानी गिरत हे ।
 मन मा पियास जगावत हे रे ।




देख के तोला जम्मो टुरा मन ।
आनी बानी  गोठियावत हे रे ।
चढ़ती जवानी देख  के रानी ।
सबो के लार चुचुआवत हे रे ।



मोर मुंह ले  बोली नइ फुटय ।
छाती मोर धकधकावत हे रे ।
तोर प्यार मा बइहा होगेवं मै ।
दाई ददा हा खिसियावत हे रे।





ए गोरी तोर गोरी सुरतिया ।
मन ला मोर भरमावत हे रे ।
तोर कटारी नैना हा मयारू ।
दिल मा छुरी  चलावत हे रे ।



आजा गोरी मोर जिनगी मा ।
जिनगी हा नइ  पहावत हे रे ।
कइसे तोर ले मिलना हो ही ।
कुछु समझ  नइ आवत हे रे ।


                        

               

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                             कृष्णा पारकर
                           बिलासपुर सीपत
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