बरखा के अगोरा मा barkha ke agora ma[Krishna parkar][Chhattisgarhi kavita][hindi kavita][kavita] [कृष्णा पारकर][छत्तीसगढ़ी कविता][हिंदी कविता][कविता]

 
बरखा के अगोरा मा ,
        हावय जम्मो किसान ।
बरसत नइहे पानी ,
         जीव होगे हलकान ।



देरी झिन होवय अब,
      खेती अउ किसानी मा ।
आशा तो बँधाए हे ,
        अषाढ़ के पानी मा ।।


दु दिन के बरसा मा,
       फुल पान हरियाए हे ।
लेकिन अभी भुईयां के,
       प्यास नइ बुझाए हे ।।



झर झर ले गिर के ,
        तन मन ला भिंगादे ।
जम्मो किसान मन के,
        भाग्य ला तै जगादे ।।


छत्तीसगढ़ के माटी मा,
        सुघ्घर लहरावय धान ।
जम्मो किसान मन ला ,
          दे दे अतेक वरदान ।।
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                             कृष्णा पारकर
                           बिलासपुर सीपत
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