कांच की तरह सपने,kach ke tarah sapne,[Krishna parkar][hindi kavita][c.g kavita][kavita] [कृष्णा पारकर][हिंदी कविता][छ.ग. कविता][कविता]

कांच की तरह सपने ,टूट कर जब बिखर जाए ,
कुछ समझ में आता नहीं ,तब इन्सान किधर जाए ,
   

मेरा जीवन हो गया है ,एक भयानक रात  सा,
दुआ तुम भी करना दोस्त, किये रात गुजर जाए ,
       

लाख खताएं माफ की पर अब थोड़ा मुश्किल है ,
कैसे उसे कोई माफ करें जो नजरों से गिर जाए ,
       



पहले मेरी ख्वाहिश थी दुनिया का नजारा कर लूँ ,
आरजु है दिल की अब मै तन्हा ही गुजारा कर लूँ,
गुमसुम हाेकर देखा है मैंने चीखते  हुए जख्मो काे ,
अब मुझसे ना हाेगा ,फिर वही हाल दाेबारा कर लूँ
         


                                                      
देखा तुझे बस एक नजर, dekha tujhe bas ek najar, कृष्णा पारकर, हिंदी कविता, कविता, Krishna parkar, hindi kavita, kavita,
                             कृष्णा पारकर
                           बिलासपुर सीपत
                       +91 93404 04933
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