कैसा गजब तुमने सिलसिला रक्खा है ।
वजह तो बताओ अपनी खामोशी का ।
किस बात पे तुमने मुंह फुला रक्खा है ।
उजाला बन कर बिखरे हो मेरे दिल मे ।
इस कदर यादों का दिया जला रक्खा है ।
दाग सा लगा है मेरे दिल मे तेरे छुने का ।
सबसे कहता फिरता हूं धुला रक्खा है ।
मुश्किल सा लगता है इरादों पर टिकना ।
यादों की तूफ़ान ने जो हिला रक्खा है ।
मुमकिन हो तो चले आना ऐ मुसाफिर ।
दरवाजा तो मैंने आज भी खुला रक्खा है।
कृष्णा पारकर
बिलासपुर सीपत
+91 93404 04933


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