ये टुरी शहर के ye turi shahar ke [.Krishna parkar][hindi kavita][c.g kavita][kavita] [कृष्णा पारकर][हिंदी कविता][छ.ग. कविता][कविता]

ये टुरी शहर के , कमसिन उमर के ।
गली मा रेंगथे जी , सम्हर पखर के ।।



मुच मुच हांसथे , देख देख के मोला ।
चढ़ती जवानी मा , उमर हे सोला ।।

तीर मा बुलाथे , ईशारा कर कर के ।
ये टुरी शहर के , कमसिन उमर के ।।



 गोरी के मुखड़ा हे , चांद के जइसे ।
मोर मन के बात , बताववं मै कइसे।।

सुन्दर हे भारी , हावय बड़े घर के ।
गली मा रेंगथे जी , सम्हर पखर के।।



टुरी के बाप हावे , बड़का धनवान ।
मै हरवं गंवईहा , मै गरीब किसान ।।

देखत रहिथे मोला, दुआरी ले घर के।
ये टुरी शहर के , कमसिन उमर के ।।
गली मा रेंगथे जी , सम्हर पखर के ।।


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                             कृष्णा पारकर
                           बिलासपुर सीपत
                       +91 93404 04933
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