गली मा रेंगथे जी , सम्हर पखर के ।।
मुच मुच हांसथे , देख देख के मोला ।
चढ़ती जवानी मा , उमर हे सोला ।।
तीर मा बुलाथे , ईशारा कर कर के ।
ये टुरी शहर के , कमसिन उमर के ।।
गोरी के मुखड़ा हे , चांद के जइसे ।
मोर मन के बात , बताववं मै कइसे।।
सुन्दर हे भारी , हावय बड़े घर के ।
गली मा रेंगथे जी , सम्हर पखर के।।
टुरी के बाप हावे , बड़का धनवान ।
मै हरवं गंवईहा , मै गरीब किसान ।।
देखत रहिथे मोला, दुआरी ले घर के।
ये टुरी शहर के , कमसिन उमर के ।।
गली मा रेंगथे जी , सम्हर पखर के ।।
कृष्णा पारकर
बिलासपुर सीपत
+91 93404 04933


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