कुण्डलिनी


//धुआँ//

निकले जहरीली धुआँ,व्याकुल है संसार।
चारो दिक में चिमनियाँ,करते हाहाकार।।
करते हाहाकार, व्योम में बनकर दानव।
मुश्किल में है प्राण,पेड़ के हो चाहे मानव।।
कह तोषन कविराज, राह है बड़ी कटीली।
घटे परत ओजोन,धुआँ निकले जहरीली।।

//धुआँ//

उगले चिमनी है धुआँ,फैले चारो ओर।
नील गगन में लालिमा,मिले नहीं अब शोर।
मिले नहीं अब शोर,कालिमा जब है छाया।
कब होगी ये भोर,जान पे बन ये आया।
कह तोषन कविराज, तनिक तो बाता सुनले।
बन्द करो सरकार, धुआँ है चिमनी उगले।।

//नदी संरक्षण//

नदियाँ गन्दी हो रही,हम है जिम्मेदार।
खुद ही में जब दोष है,करते क्या सरकार।।
करते क्या सरकार,नदी है अब आफत में।
रक्षण की है बात,योजना की लागत में।
कह तोषन कविराज, भूलकर अपनी कमियाँ।
सरिता माता मान,सभी सिरजाओ नदियाँ।

//गरीबी//

घर मे हैं कुछ नही,पढ़ने की सुध नहीं,
भोर से है निकले जो,रोटी की जुगाड़ में।
होटल हो चाहे बासा,रोजी की है इक आशा,
इत उत डिब्बा बीने,बेचें है कबाड़ में।
मारे है गरीबी जिन्हें,बोलो भला कैसे जिये,
पाठशाला जाते नहीं, झाँके है किवाड़ में।
तोषन है गरीब मेरे,फूटे है नसीब तेरे,
बाल होके काज करे,दिल्ली क्या मेवाड़ में।

//गौ रक्षा//

गौ रक्षा की बात पे,बन जा साथी ढाल।
माता अपनी कह रही,जागो मेरे लाल।।
जागो मेरे लाल,समय है ऐसा आया।
करती गायें आह,कहर है कैसा छाया।।
कह तोषन कविराज, नया हो भारत नक्शा।
साथी आओ आज,करें मिल गौ  की रक्षा।।

//गौ रक्षा//

कब होगी साकार ये,गौ रक्षा की बात।
दाँव पेच में रह गयी,मिले कहाँ सौगात।।
मिले कहाँ सौगात,आस में लटकी सपने।
कितनी मिलती गाय,देख लो सब घर अपने।।
कह तोषन कविराज,गाय गुण गाते जोगी।
चिन्ता का है विषय,गाय कब रक्षित होगी।।

//मंहगाई//

देख मंहगाई यहाँ,मचा रही है लूट।
हाय हाय जनता करे,सबके छक्के छूट।।
सबके छक्के छूट,रहे मन को मार यहाँ।
दुखी रहे इन्सान,कहे हैं अब जिये कहाँ।
कह तोषन कविराज,प्रभो मेरे  कन्हाई।
मचती हाहाकार,यहाँ देख मंहगाई।।

//अंडा//

अंडा सोया मिल रहा,बच्चे नाचे झूम।
सरकारी आदेश है,मचा रही है धूम।।
मचा रही है धूम,आस्तिक मन कतरावे।
कहाँ फँसे है आन,जरा भी रास न आवे।।
कह तोषन कविराज,फाँस ये कैसा फंडा।
आधे मन को मार,आध है खाये अंडा।।

//शिक्षक//

बनकर शिक्षक आज जो,बाँट रहे है ज्ञान।
महिमा इनकी है बड़ी,गाते सन्त सुजान ।।
गाते सन्त सुजान,दोष सब दूर हटाते ।
गुरुवर है भगवान,ब्रह्म भी शिव भी गाते ।।
कह तोषन कविराज,वृक्ष है सीधा तनकर ।
धन्य धन्य यह प्राण,खड़े है शिक्षक बनकर।।

//पालीथीन//

देखो पॉलीथीन के , बढ़ी निराली बात।
दुष्प्रभाव से जान लो  , खानी पड़ती मात।।
खानी पड़ती मात , जान कर चुप्पी साधा.
तड़पे पर्यावरण , धरा जो पनपी बाधा।
कह तोषन कविराज,देख के लाखों लेखों।
त्यागो पालीथीन,बन्द अब करके देखो।

//मोबाइल//

मोबाइल जो हाथ में ,आते खूब विचार।
फँसते अंतरजाल जो,मिले अलग संसार।।
मिले अलग संसार, भरे है सार खजाना।
सदुपयोग लो जान,दिशा है देती नाना।
कह तोषन कविराज,चेहरे आती स्माइल।
छोट बड़े मत जान,हाथ में है मोबाइल।।

//सूरज//

सूरज बाँटे रौशनी , जगमग है संसार।
चलना जिसका काम है , करे सदा उपकार।।
करे सदा उपकार , वही है खुशियाँ  पाता।
मिलकर रहना सार , यही है निर्मल नाता।।
बढ़ते रहना राह , फूल हो चाहे काँटे।
प्रेम दया सद्भाव , नित्य ही खुशियाँ बाँटे।।

//पेड़//

पेड़ लगा लो आज सब,एक बात लें मान।
होगी हरियाली भली, तृप्ति   मिलेगी  जान।।
तृप्ति मिलेगी प्रान,समझ रख इंसान सही।
पर्यावरण को जान,भरे हैं  भण्डार  यहीं।।
हो रक्षित  यह धरा, एक पल समय निकालो।
वट पीपल हो शूमि,आज सब पेड़ लगालो।।

तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगंइहा, डौंडी लोहारा
सरस्वती शिशु मंदिर
डौंडी लोहारा

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