कविता


समसामयिक रचना

आसुरी प्रवृत्ति

अपने भारत  देश मे  देखो,
कानून भले कितने भी बड़े।
कैसे  बचेंगी  बेटी भँवर से ,
दानव पग -पग जो है खड़े।।१।।

देख  तेरे  संसार  में  दाता,
दुखदायिनी है घटना घटती।
शील संरक्षण खातिर औरत,
कहाँ कहाँ  रहती भटकती।।२।।

दारू गाँजा के नशेड़ी सारे,
बेटी की अस्मत लगे लूटने।
लगता ऐसा अब न्याय की,
तर तर लगे है पछीने छुटने।।३।।

कितनी बेटियां है झौंकी गई,
बुराईयों की भड़की आग में।
कब तक आतंकित रहे यहाँ,
लगे मरहम  कब  ये दाग में।।४।।

बेटी  माता बहू  रक्षा  खातिर,
आखिर जायें तो जायें कहाँ।
अंत कब होगा अत्याचार का,
तोषन का हृदय थर्राये  यहाँ।।५।।

✒✒✒✒✒
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगंइहा, डौंडी लोहारा
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