घनाक्षरी
आ जाओ हे प्यारे कान्हा,
करके कोई बहाना,
भारत की धरती ये,
तुझको बुलाती है।
दे जा वही गीता ज्ञान,
फिर हो पवित्र प्राण,
कोटिक कलुष भरे,
दुनिया सताती है।
द्रोपदी की लाज रखी,
यही आस मन जगी,
मिलकर बेटियाँ ये,
पुकार लगाती है।
शंखनाद कर देते,
सारी पीड़ा हर लेते,
गौमाता निहारती है,
याद में रंभाती है।
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगंइहा, डौंडी लोहारा

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