* सुनता ह घलो छरियाथे *
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रहिबोंन मिलजुल भइया,
बल ह सबके बंधाथे ।
रहिबोंन छर्री दर्री तब,
सुनता घलो छरियाथे।।
पांचो अंगरी एके मिलके,
जबर मुटका बंधाथे।
कइसे एकता म बल होथे,
फरिहा के बताथे।।
ऊँच नीच के खांचा ल,
सुमत के माटी म पाटो।
भेद भाव ल दुरिहा करके,
मया के चारा ल बांटो।।
संग म रहना जीना मरना,
बिधि के इही बिधान हे।
कोन मानबे तै बैरी दुश्मन,
कोन तोर मितान हे।।
एक दूसर ल जानव मानव,
सबो के राखव मान।
मया पिरीत के बाँटे ले,
काकरो नइ घटय शान ।।
काकरो नइ घटय शान ।।
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नोहर आर्य,
फरदडीह, जिला बालोद, छत्तीसगढ़ ।
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रहिबोंन मिलजुल भइया,
बल ह सबके बंधाथे ।
रहिबोंन छर्री दर्री तब,
सुनता घलो छरियाथे।।
पांचो अंगरी एके मिलके,
जबर मुटका बंधाथे।
कइसे एकता म बल होथे,
फरिहा के बताथे।।
ऊँच नीच के खांचा ल,
सुमत के माटी म पाटो।
भेद भाव ल दुरिहा करके,
मया के चारा ल बांटो।।
संग म रहना जीना मरना,
बिधि के इही बिधान हे।
कोन मानबे तै बैरी दुश्मन,
कोन तोर मितान हे।।
एक दूसर ल जानव मानव,
सबो के राखव मान।
मया पिरीत के बाँटे ले,
काकरो नइ घटय शान ।।
काकरो नइ घटय शान ।।
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नोहर आर्य,
फरदडीह, जिला बालोद, छत्तीसगढ़ ।

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