हम आदिवासी के,
इहिच पहिचान।
एक तीर अउ एक कमान।।
* जंगल झाड़ी बपौती ये,
इही जिनगी इही रउती ये।
नानपन के जानत हंन,
इही हमर पुरखौती ये।।
* मोर कोरा म करमा ददरिया,
मंजूर परेवना नाचत हे।
जुर मिल के रहिथों तब तो,
मोर रखवारी ले बांचत हे।।
* पेड़ कटइया उधवा नापत हे,
महल अटारी अपन खापत हे।
सुवारथ बर धुर्रा धरा के,
परियावरन के माला जापत हे।।
* जंगल मोर करम के बासा,
झन करव एकर बिनासा।
एक दिन अइसे होही संगी
हावा पानी बर छुटही आसा।।
* आओ सुग्घर ये तिहार मनाओ।
जिनगी ल अपन सुफल बनाओ।।*
परकिरिती के हम रखवार,
जीव जंतु के मांड़ा आय।
सबो जीव संग मोर मितानी,
मोरों इंहेच बांड़ाआय।।
* कांदा कुसा फर फरहरी,
इही हमरअहारी ये।
हमर हक तो होवय।
नोहे जंगल सरकारी ये।।
* डारा पाना पान पतौवा,
सुग्घर मोर बिछौना हे ।
सबले सिधवा भोला भाला,
जल जंगल मोर मिलौना हे।।
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नोहर आर्य,
फरदडीह,जिला बालोद,छत्तीसगढ़ ।
इहिच पहिचान।
एक तीर अउ एक कमान।।
* जंगल झाड़ी बपौती ये,
इही जिनगी इही रउती ये।
नानपन के जानत हंन,
इही हमर पुरखौती ये।।
* मोर कोरा म करमा ददरिया,
मंजूर परेवना नाचत हे।
जुर मिल के रहिथों तब तो,
मोर रखवारी ले बांचत हे।।
* पेड़ कटइया उधवा नापत हे,
महल अटारी अपन खापत हे।
सुवारथ बर धुर्रा धरा के,
परियावरन के माला जापत हे।।
* जंगल मोर करम के बासा,
झन करव एकर बिनासा।
एक दिन अइसे होही संगी
हावा पानी बर छुटही आसा।।
* आओ सुग्घर ये तिहार मनाओ।
जिनगी ल अपन सुफल बनाओ।।*
परकिरिती के हम रखवार,
जीव जंतु के मांड़ा आय।
सबो जीव संग मोर मितानी,
मोरों इंहेच बांड़ाआय।।
* कांदा कुसा फर फरहरी,
इही हमरअहारी ये।
हमर हक तो होवय।
नोहे जंगल सरकारी ये।।
* डारा पाना पान पतौवा,
सुग्घर मोर बिछौना हे ।
सबले सिधवा भोला भाला,
जल जंगल मोर मिलौना हे।।
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नोहर आर्य,
फरदडीह,जिला बालोद,छत्तीसगढ़ ।

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