कुण्डलियाँ*
नायक पातर कस सगा,करही नाज समाज।
धरम करम ला राखके ,करलौ बढ़िहा काज।।
करलौ बढ़िहा काज,रहव जी हिलमिल जुलके।
जलय सुमत के जोत,फूलवा हाँसय खुलके।
मिलही सबला मान,बनव गा सबके लायक।
सबके निकले बोल,हमर हे अगुवा नायक।
तोषण चुरेन्द्र दिनकर
धनगाँव डौंडीलोहारा
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