तप्त धरा और नन्हा प्राण(तोषण कुमार चुरेन्द्र)



​कड़कती धूप में जलती वसुधा, अंगारों की सेज बनी है।
​प्यास से व्याकुल छोटी गौरैया, मौत की दहलीज पे तनी है।
​कण्ठ कुम्हलाया, काया काँपी, कण-कण तरसा पानी को।
​भूल गई वो चहक अपनी, और पंखों की मनमानी को।

​मेघों का सागर पी जाए, ऐसी तृषा जगी मन में।
​पर एक बूंद भी शेष नहीं है, इस निर्दयी जन-मन में।
​तब एक कोमल हाथ बढ़ा, ममता का आँचल फैलाए।
​मिट्टी का छोटा-सा सकोरा, अमृत-रस भर कर लाए।

​शीतल जल साक्षात गंगा है, इस नन्हीं सी जान के लिए।
​जैसे कोई स्वर्ग उतर आया हो, पंछी के सम्मान के लिए।
​दाने-दाने में दिखती है, दानी की वो दया महान।
​सकोरे की उस छाया में, सिमटा है सारा आसमान।

​मानो विधाता स्वयं आ गए, मां का रूप धर आँगन में।
​दुलार रहे हों उस अबोध को, भर कर नेह अन्तर्मन में।
​एक घूँट पीकर पंछी ने, सूरज को भी शीतल कर डाला।
​तृप्त हुई जब उसकी आत्मा, चमका जग का उजियाला।

​पुलकित पंख, पावन पानी, प्रेम का यह अनूठा संगम।
​छोटे से सकोरे ने हर लिया, जीवन का सारा ही ग़म।
​वात्सल्य उमड़ा धरा पर ऐसा, कि देवलोक भी झुक जाए।
​जहाँ जीव की सेवा ही, सबसे बड़ा धर्म कहलाए।

-तोषण चुरेन्द्र 'दिनकर' 
धनगाँव डौंडीलोहारा 
बालोद छत्तीसगढ़

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