कड़कती धूप में जलती वसुधा, अंगारों की सेज बनी है।
प्यास से व्याकुल छोटी गौरैया, मौत की दहलीज पे तनी है।
कण्ठ कुम्हलाया, काया काँपी, कण-कण तरसा पानी को।
भूल गई वो चहक अपनी, और पंखों की मनमानी को।
मेघों का सागर पी जाए, ऐसी तृषा जगी मन में।
पर एक बूंद भी शेष नहीं है, इस निर्दयी जन-मन में।
तब एक कोमल हाथ बढ़ा, ममता का आँचल फैलाए।
मिट्टी का छोटा-सा सकोरा, अमृत-रस भर कर लाए।
शीतल जल साक्षात गंगा है, इस नन्हीं सी जान के लिए।
जैसे कोई स्वर्ग उतर आया हो, पंछी के सम्मान के लिए।
दाने-दाने में दिखती है, दानी की वो दया महान।
सकोरे की उस छाया में, सिमटा है सारा आसमान।
मानो विधाता स्वयं आ गए, मां का रूप धर आँगन में।
दुलार रहे हों उस अबोध को, भर कर नेह अन्तर्मन में।
एक घूँट पीकर पंछी ने, सूरज को भी शीतल कर डाला।
तृप्त हुई जब उसकी आत्मा, चमका जग का उजियाला।
पुलकित पंख, पावन पानी, प्रेम का यह अनूठा संगम।
छोटे से सकोरे ने हर लिया, जीवन का सारा ही ग़म।
वात्सल्य उमड़ा धरा पर ऐसा, कि देवलोक भी झुक जाए।
जहाँ जीव की सेवा ही, सबसे बड़ा धर्म कहलाए।
-तोषण चुरेन्द्र 'दिनकर'
धनगाँव डौंडीलोहारा
बालोद छत्तीसगढ़
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