गोरी तोर हंसना[छत्तीसगढ़ी कविता] gori tor hansna krishna parkar kavita कृष्णा पारकर कविता

गोरी तोर हंसना,छत्तीसगढ़ी कविता,gori tor hansna,krishna parkar, kavita,कृष्णा पारकर,कविता

गोरी तोर हंसना
गोरी तोर हंसना अउ तोर लजाना ।
सुरता आथे रे मोला गुजरे जमाना ।




घर ले निकलना ,
            देखे बर तोला ।।
रस्ता म रूकना ,
            छेंके बर तोला ।।



तोर संग रे मन के बात गोठियाना ।
सुरता आथे रे मोला गुजरे जमाना ।

मया के पहिली नजर,
       अंतस मा समाए हे ।।
तभे तो आज तक ,
       सुरता नइ भुलाए हे ।।




मुड़ मुड़ के देखना अउ मुस्कुराना ।
सुरता आथे रे मोला गुजरे जमाना ।

गोरी तोर नैना ले ,
           जादु तै चलाए ।।
जादू चलाके मोला,
         मया मा फंसाए ।।



देखके तोला दिल हो जाय दिवाना ।
सुरता आथे रे मोला गुजरे जमाना ।

रानी तोर चेहरा ,
           दिल मा बसगे ।।
ये दिल दिवाना ,
         फांदा मा फंसगे ।।




कइसे रहवं मै अब तहीं ह बताना ।
सुरता आथे रे मोला गुजरे जमाना ।





            **Krishna Parkar**
               Bilaspur sipat cg
               +91 93404 04933

कोई भी अंश तोड़ मडोर कर प्रस्तुत न करें इस कविता से सम्बंधित सभी copyrigth इस वेबसाइट और कवि के पास है कविता कॉपी पेस्ट करने पर साईट और गीतकार का नाम जरुर दर्शाए नही तो कॉपीराइट एक्ट के तहत आप पर कानूनी कार्यवाही हो सकता है सर्वसाधारण को सुुुचित किया जाता है।


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ