सावन के रिमझिम फुहार बनके sawan ke rimjhim fuhar banke-[.Krishna parkar][hindi kavita][c.g kavita][kavita] [कृष्णा पारकर][हिंदी कविता][छ.ग. कविता][कविता]

सावन के रिमझिम फुहार बनके ।
जिनगी मे आजा न बहार बनके ।



आजा ना गोरी , दिल बेकरार हे ।
दिल मा समाजा तै करार बनके ।

मोर मन कहिथे कभु झन उतरे ।
तोर मया चढ़गे न बुखार बनके ।



फुर्सत के बेरा, मिल जाए मोला ।
कभु तो आजा तै इतवार बनके ।

तोर बिना मोर ये मन नई मानय ।
रही जा तै मोर जोड़ीदार बनके ।



फुल जैसे दिल हा, मुरझावत हे ।
अब तो बरस जा बौछार बनके ।

मया के मंदिर  मिल के बनाबो ।
दुनिया मा रहय यादगार बनके ।


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                             कृष्णा पारकर
                           बिलासपुर सीपत
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