वे लोग जो महफिल मे, हंसते और मुस्कुराते हैं ।
अक्सर ही मैंने देखा है ,छुपकर आंसू बहाते हैं ।।

खुद को गर मै खुदा कहुं ,
      तो खुदा नहीं बन जाऊंगा ।
             मै तो हुं माटी का पुतला ,
                    माटी मे मिल जाऊंगा ।।

दिल नादान नहीं मानता ,
      इसे कैसे मै समझाऊंगा ।
               गुंगे की चाहत है ऐसी ,
                    के गीत कभी मै गाऊंगा ।।

राग-रंग इस दुनिया की ,
      अब तक समझ ना पाया हूँ ।
              क्षमा चाहता हूँ उन सबसे ,
                 दिल जिनका भी दुखाया हूँ ।।

अभी नहीं मालूम मुझे,कब तक मंजिल पाऊंगा ।
मै तो हूँ माटी का पुतला ,माटी में मिल जाऊंगा ।।

        **कृष्णा पारकर**

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