अवहेलना,
मत करना अवहेलना,कभी बड़ों की बात।
दुआ कभी मिलता नहीं,हो दिन चाहे रात।।
विवेचना,
करिए कर्म विवेचना,रखिए सदा ये ध्यान।
धन दौलत जब पास हो,ना रख कभी गुमान।।
व्याप्त,
गुण अवगुण सब व्याप्त है,यही जगत की रीत।
मीठी वाणी बोल के,सकल विश्व लो जीत।
आकंठ,
भरा हुआ आकंठ तक,सदा पतित में दंभ।
झुकना कभी न जानते,तने रहे बन खंभ।
ममता,
माँ की ममता को भला,आँक सके न कोय।
भरकर सुत के पेट को,खुद ही भूखी सोय।।
प्रलाप,
सुख दुख के इस खेल में,करते नहीं प्रलाप।
धैर्य मन में धारिए,मिट जाए संताप।।
लालसा,
त्यागें मन की लालसा,करें ईश का ध्यान।
धन दौलत साथी नहीं,रखिए इसका ज्ञान।।
वन्दना,
मातु पिता की वन्दना,करलें आठों याम।
जिनके पुण्य प्रताप से,बनते बिगड़े काम।।
चापलूस,
चापलूस के काम का,रहता जग में शोर।
बड़े-बड़े ठग जात हैं,क्या ठाकुर क्या चोर।।
झंझावत
आते झंझावत शाम जो,हिय में उठती आह।
पिया गये परदेश को,घर से तकती राह।।
तोषण कुमार चुरेन्द्र
धनगंइहा,डौंडी लोहारा
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