गेंद
अस्थिरता का प्रमाणिक वस्तु
जो अनवरत गतिमान
परन्तु मन-बेमन
चाहकर भी अस़मर्थ,,,विरोध को
और,
एक से दूसरे हाथों में
जकड़ने मजबूर
शायद,
उनका अस्तित्व हमारे लिए बे-अर्थ
पर
क्या यह परिभाषा गेंद की ही है?
नहीं
अपनी जिंदगी देखिये
समय के फेर में हम सब
कवि/गीतकार
शास,माध्य,शा,- करैहा
सुरही नरहरपुर,कांकेर,छ,ग,
9340389771
कोई भी अंश तोड़ मडोर कर प्रस्तुत न करें इस कविता से सम्बंधित सभी copyrigth इस वेबसाइट और कवि के पास है कविता कॉपी पेस्ट करने पर साईट और गीतकार का नाम जरुर दर्शाए नही तो कॉपीराइट एक्ट के तहत आप पर कानूनी कार्यवाही हो सकता है सर्वसाधारण को सुुुचित किया जाता है।
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2 टिप्पणियाँ
Nice
जवाब देंहटाएंउत्तम
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